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MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 11 प्रमुख सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ

MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 11 प्रमुख सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ

MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 11 प्रमुख सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ

Table of content (TOC)

MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 11 प्रमुख सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ

MP Board Class 9th Social Science Chapter 11 पाठान्त अभ्यास

MP Board Class 9th Social Science Chapter 11 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

सही विकल्प चुनकर लिखिए

प्रश्न 1.
रथ-चालक कांस्य प्रतिमा कहाँ से प्राप्त है?
(i) दैमाबाद
(ii) मोहनजोदड़ो
(iii) कालीबंगा
(iv) पंजाब।
उत्तर:
(ii) मोहनजोदड़ो

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प्रश्न 2.
प्रथम नगरीकरण कब हुआ?
(i). नव पाषाण काल में
(ii) सिन्धु सभ्यता में
(iii) मौर्य काल में
(iv) गुप्तकाल में।
उत्तर:
(ii) सिन्धु सभ्यता में

प्रश्न 3.
चित्रकला में वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन-अध्यापन की बात गुप्तकाल में किसने कही?
(i) वात्सायन ने
(ii) अशोक ने
(iii) समुद्रगुप्त ने
(iv) कुमारगुप्त ने।
उत्तर:
(iii) समुद्रगुप्त ने

प्रश्न 4.
वीणाधारी सिक्कों का चलन किस राजवंश ने किया? (2014)
(i) मौर्य राजवंश
(ii) गुप्त राजवंश
(iii) वर्धन वंश
(iv) राजपूत वंश।
उत्तर:
(ii) गुप्त राजवंश

प्रश्न 5.
कव्वाली का जनक था (2008,09)
(i) अकबर
(ii) शाहजहाँ
(iii) तानसेन
(iv) अमीर खुसरो।
उत्तर:
(iv) अमीर खुसरो।

सही जोड़ी बनाइए

MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 11 प्रमुख सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ


उत्तर:

  1. → (घ)
  2. → (क)
  3. → (ख)
  4. → (ग)
  5. → (च)
  6. → (ङ)।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 11 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सिन्धु सभ्यता के सबसे लम्बे अभिलेख में कितने अक्षर हैं?
उत्तर:
सिन्धु सभ्यता में अब तक लगभग 2500 से अधिक अभिलेख प्राप्त हैं। सबसे लम्बे अभिलेख में 17 अक्षर हैं।

प्रश्न 2.
दीपवंश, महावंश, दिव्यावदान किस साहित्य से सम्बन्धित हैं?
उत्तर:
दीपवंश, महावंश, दिव्यावदान बौद्ध साहित्य से सम्बन्धित हैं।

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प्रश्न 3.
कल्पसूत्र और परिशिष्ट पर्व किस धर्म की साहित्यिक कृति है?
उत्तर:
भद्रबाहु का कल्पसूत्र और हेमचन्द्र का परिशिष्ट पर्व जैन धर्म की साहित्यिक कृति है।

प्रश्न 4.
तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, रसखान किस भक्ति मार्ग के उपासक थे?
उत्तर:
तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, रसखान सगुण भक्ति मार्ग के उपासक थे।

प्रश्न 5.
एलोरा के मन्दिरों का निर्माण किस काल में हुआ? (2008,09)
उत्तर:
एलोरा के मन्दिरों का निर्माण गुप्तकाल में हुआ।

प्रश्न 6.
ताजमहल किसने बनवाया था? (2018)
उत्तर:
ताजमहल मुगल सम्राट शाहजहाँ ने बनवाया था। यह 313 फुट ऊँचा चौकोर संगमरमर का मकबरा है। जो 22 फुट ऊँचे चबूतरे पर बना है। चबूतरे के चारों कोनों पर एक-एक मीनार है और शीर्ष भाग पर एक गुम्बद है।

प्रश्न 7.
तानसेन कौन थे?
उत्तर:
अकबर के दरबार में नवरत्नों में से एक रत्न तानसेन उस युग का सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञ था। वृन्दावन के बाबा हरिदास तानसेन के गुरु थे।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 11 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गुप्तकालीन चित्रकला की विशेषताएँ लिखिए। (2008, 09, 10, 14, 16, 18)
उत्तर:
गुप्तकाल में चित्रकला वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित थी। चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अजन्ता की गुफाओं के चित्र हैं इसे विश्व धरोहर के रूप में शामिल किया गया है। ये चित्र मुख्यतः धार्मिक विषयों पर आधारित हैं। इसमें बुद्ध और बोधिसत्व के चित्र हैं। जातक ग्रन्थों के वर्णनात्मक दृश्य हैं। यह चित्र वास्तविक, सजीव तथा प्रभावोत्पादक हैं। इस काल की चित्रकला बाघ (म. प्र. में धार जिले में) की गुफाओं में भी देखी जा सकती है। इन गुफाओं के चित्रों के विषय लौकिक हैं। इस काल में चित्रकारी में सुन्दर रंगों का प्रयोग किया गया है।

प्रश्न 2.
सिन्धु सभ्यता की वास्तुशिल्प की विशेषताएँ लिखिए। (2008, 09, 12, 16)
उत्तर:
सिन्धु घाटी के मोहनजोदड़ो व हड़प्पा नगर की खुदाई से तत्कालीन वास्तुशिल्प की जानकारी मिलती है। इस काल में लोग भवन निर्माण कला में दक्ष थे। विशाल अन्नागार, मकान, सुनियोजित नगर, बड़े प्रासाद, बन्दरगाह, स्नानागार आदि तत्कालीन वास्तुशिल्प पर पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। तत्कालीन अवशेषों को देखकर किसी आधुनिक विकसित नगर से इनकी तुलना की जा सकती है। पक्की ढुकी हुई नालियाँ, भवनों के खिड़की-दरवाजे मुख्य मार्ग से विपरीत बनाना, भवनों में रसोईघर, स्नानागार, रोशनदान की पर्याप्त व्यवस्था, साधारण व राजकीय भवनों का निर्माण आदि तत्कालीन वास्तुशिल्प के अनुपम उदाहरण हैं। सिन्धु सभ्यता के नगर में प्रथम नगरीकरण के प्रमाण हैं।

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प्रश्न 3.
अशोक के स्तम्भ पर टिप्पणी लिखिए। (2008, 09, 10, 14, 15, 18)
उत्तर:
मौर्य वास्तुकला के सर्वोत्तम नमूने अशोक के स्तम्भ हैं। जो कि उसने धम्म के प्रचार हेतु बनवाये थे। ये स्तम्भ संख्या में लगभग 20 हैं। ये स्तम्भ देश के विभिन्न भागों में स्थित हैं। उत्तर प्रदेश में सारनाथ, प्रयाग, कौशाम्बी, नेपाल की तराई में लुम्बनी व निग्लिवा में अशोक के स्तम्भ मिले हैं। इन स्थानों के अतिरिक्त साँची, लोरिया, नन्दगढ़ आदि स्थानों में भी अशोक के स्तम्भ मिले हैं। स्तम्भों में शीर्ष अत्यधिक कलापूर्ण बनाये जाते थे। मौर्यकालीन स्थापत्य कला के प्रसिद्ध स्तम्भ लेख-साँची (म. प्र.), सारनाथ (उ. प्र.), गुहालेख-बाराबर, नागार्जुनी (बिहार) एवं स्तूप-साँची (म. प्र.) बोधगया (बिहार) में हैं।

प्रश्न 4.
गुप्तकालीन मन्दिरों की विशेषताएँ बताइए। (2008, 09, 12, 13, 15, 17)
अथवा
गुप्तकालीन वास्तुशिल्प की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
गुप्तकाल में वास्तुशिल्प चर्मोत्कर्ष पर थी। इस काल की विशेष उपलब्धि मन्दिर निर्माण रही है। मन्दिर ईंट तथा पत्थरों आदि से बनाये जाते थे। गुप्तकाल में बने मन्दिरों की छतें सपाट थीं। सबसे पहले देवगढ़ (झाँसी, उ. प्र.) के दशावतार मन्दिर में शिखर का निर्माण हुआ था, इसके बाद ही मन्दिरों में शिखर बनने शुरू हो गये। इनमें से अनेक मन्दिर आज भी अबस्थित हैं; जैसे-म. प्र. में विदिशा जिले में साँची का मन्दिर उत्तर प्रदेश में झाँसी तथा भीतरगाँव (महाराष्ट्र) के देवगढ़ के मन्दिर इसके उदाहरण हैं। अजन्ता की 16, 17, 19 नम्बर की गुफा गुप्तकालीन मानी जाती है। उदयगिरि (विदिश म. प्र.), बाघ (धार म. प्र.) आदि गुफाओं का निर्माण गुप्तकाल में हुआ था। गुप्तकाल के शिल्पकार लोहे तथा काँसे के काम में कुशल थे। नई दिल्ली में महरौली में स्थित लौह स्तम्भ लौह प्रौद्योगिकी का एक अनुपम उदाहरण है जिसे ईसा की चौथी शताब्दी में बनाया गया था और आज तक इसमें जंग नहीं लगा।

प्रश्न 5.
नागर शैली व द्राविड़ शैली के मन्दिर में क्या अन्तर है? लिखिए।(2009, 14, 16, 18)
उत्तर:
उत्तर भारत के अतिरिक्त दक्षिण भारत व पूर्वी भारत में भी अनेक मन्दिरों का निर्माण हुआ। इस काल में बने मन्दिरों को मुख्यतः दो शैलियों में विभाजित कर सकते हैं-नागर शैली व द्राविड़ शैली। इन दोनों शैलियों में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं –
नागर व द्राविड़ शैली में अन्तर

नागर शैलीद्राविड़ शैली
1. नागर शैली के मन्दिर प्रमुखतया उत्तर भारत में पाये जाते हैं।1. द्रविड़ शैली के मन्दिर प्रमुखतया दक्षिण भारत में पाये जाते हैं।
2. नागर शैली में मन्दिरों के शिखर लगभग वक्राकार होते हैं।2. द्राविड़ शैली में मन्दिरों के शिखर आयताकार होते हैं।
3. नागर शैली में मन्दिरों के शिखर पर गोलाकार आमलक और कलश पाया जाता है।3. द्राविड़ शैली में मन्दिरों के शिखर आयताकार खण्डों की सहायता से बनते हैं।

प्रश्न 6.
मथुरा व गांधार कला में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2008, 09, 11, 13, 14, 16, 18)
उत्तर:
मथुरा व गांधार कला में अन्तर

मथुरा कलागांधार कला
1. मथुरा कला राजस्थान व उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में विकसित हुई।1. गांधार कला पुष्कलरावती, तक्षशिला, पुरूषपुर  (पेशावर) के आस-पास विकसित हुई।
2. मथुरा कला की मूर्तियों के लिये बिंदीदार लाल पत्थर का प्रयोग किया गया है।2. गांधार कला में मूर्तियाँ चूने, सीमेण्ट, पकी हुई मिट्टी और चिकनी मिट्टी तथा पत्थर की है।
3. मथुरा कलाकारों ने शारीरिक सुन्दरता के स्थान पर स्थलाकृतियों को आध्यात्मिक आकर्षण देने का प्रयास किया है।3. मूर्तियों को अधिक आकर्षक और सुन्दर बनाने का प्रयास किया गया है। इसके लिये वस्त्रों और आभूषणों का खूब प्रयोग किया गया।
4. इस कला के विषय, विचार और भाव भारतीय हैं। परन्तु मूर्तियाँ बनाने का ढंग भी भारतीय है।4. इस कला के विषय, विचार और भाव ही भारतीय नहीं थे वरन् बनाने के ढंग यूनानी है।
5. इस कला में बुद्ध और बोधिसत्वों के अतिरिक्त अनेक हिन्दू और जैन देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनायी गयीं।5. इस कला में महात्मा बुद्ध और बोधिसत्वों की आदमकद मूर्तियों का निर्माण किया गया है।

प्रश्न 7.
मध्यकालीन चित्रकला की विशेषताएँ लिखिए। (2017)
उत्तर:
सल्तनत काल में चित्रकला का पतन हुआ। फिर भी गुजरात, राजस्थान, मालवा के क्षेत्रों में चित्रकला जीवित रही। मध्यकालीन चित्रकला की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं –

  1. यहाँ धार्मिक जनजीवन से सम्बन्धित चित्र प्रस्तुत किये।
  2. मालवा और राजस्थानी चित्रकला शैलियों का विकास हुआ।
  3. गुजरात में जैन मुनियों द्वारा ताड़पत्र पर लिखे हुए ग्रन्थों में उच्चकोटि के छोटे-छोटे चित्र बनाये गये।
  4. मुगलकालीन चित्रों की विशेषता है-विदेशी पेड़-पौधों और उनके फूल-पत्तों, स्थापत्य अलंकरण की बारीकियाँ साज समान के साथ स्त्री आकृतियाँ, अलंकारिक तत्वों के रूप में विशिष्ट राजस्थानी चित्रकला।
  5. जहाँगीर के काल में छवि चित्र (व्यक्तिगत चित्र) प्राकृतिक दृश्यों एवं व्यक्तियों के सम्बन्धित चित्रण की पद्धति आरम्भ हुई।
  6. शाहजहाँ के काल में चित्रों में रेखांकन और बॉर्डर बनाने में विशेष प्रगति हुई।

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MP Board Class 9th Social Science Chapter 11 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत की प्रमुख सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ कौन-सी हैं? किसी एक का प्राचीनकाल एवं मध्यकाल के सन्दर्भ में तुलनात्मक विवरण लिखिए।
उत्तर:
सांस्कृतिक प्रवृत्तियों से आशय यहाँ की भारतीय संस्कृति के स्वरूप से है। भारत की प्रमुख सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ साहित्य, चित्रकला, वास्तुकला, मूर्तिकला, नृत्य एवं संगीत एवं अन्य ललित कलाएँ हैं।

वास्तुकला :
वास्तुकला मानव जीवन के रीति-रिवाजों और तत्कालीन समय की सभ्यता व समाज व्यवस्था पर प्रकाश डालती है। किसी भी युग के इतिहास का अनुमान उस युग की निर्मित इमारतों से लगाया जा सकता है। वास्तुशिल्प तत्कालीन समय के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक इतिहास की जानकारी देने में सक्षम होता है।

प्राचीनकाल व मध्यकाल की वास्तुकला का तुलनात्मक अध्ययन
प्राचीनकाल में वास्तुकला :
प्राचीन काल में लोग भवन निर्माण कला में दक्ष थे। विशाल अन्नागार, मकान, सुनियोजित नगर, बड़े प्रासाद, बन्दरगाह, स्नानागार, पक्की ढंकी हुई नालियाँ, भवनों के खिड़की-दरवाजे मुख्य मार्ग से विपरीत बनाना, भवनों में रसोई घर, स्नानागार, रोशनदान की पर्याप्त व्यवस्था, साधारण व राजकीय भवनों के निर्माण आदि तत्कालीन वास्तु शिल्प के उदाहरण हैं। सिन्धु सभ्यता के नगर भारत में प्रथम नगरीकरण के प्रमाण हैं।

वैदिककाल में यज्ञवेदियों, हवनकुण्डों, यज्ञ शालाओं, पाषाण-प्रासादों, खम्बों व द्वारों वाले भवनों, आश्रमों का उल्लेख मिलता है। इस काल में बड़े-बड़े राजप्रसादों व भवनों का उल्लेख मिलता है। मौर्य वास्तुकला के सर्वोत्तम नमूने अशोक के स्तम्भ, अशोक द्वारा निर्मित बौद्ध स्तूप, पाटलिपुत्र स्थित राज प्रसाद, गया में बारांबर तथा नागार्जुनी पहाड़ियों के पहाड़ों को काटकर तैयार किये गये चैत्य गृह-आवास आदि हैं।

गुप्तकाल में वास्तुकला चर्मोत्कर्ष पर थी। इस काल की विशेष उपलब्धि मन्दिर निर्माण रही है। मन्दिर ईंट तथा पत्थरों से बनाये जाते थे इनकी छतें सपाट होती थीं। सबसे पहले देवगढ़ (झाँसी, उ. प्र.) के दशावतार मन्दिर में शिखर का निर्माण हुआ, इसके पश्चात् ही मन्दिरों में शिखर का निर्माण होने लगा। गुप्तकाल में शिल्पकार लोहे तथा कांसे का काम करने में कुशल थे। नई दिल्ली में महरौली स्थित लौह स्तम्भ लौह प्रौद्योगिकी का अनुपम उदाहरण है। यह ईसा की चौथी शताब्दी में बना था इसमें अभी तक जंग नहीं लगी है।

पूर्व मध्यकाल में शासक अपने वैभव को प्रदर्शित करने के लिये विशाल मन्दिरों का निर्माण करवाते थे। इस काल में बने मन्दिरों में खजुराहो का मन्दिर समूह, ओसिया में ब्राह्मण तथा जैन मन्दिर, चित्तौड़गढ़ में कालिका देवी का मन्दिर व आबू में जैन मन्दिर इस काल की वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

मध्यकाल की वास्तुकला :
भारत में मध्यकालीन वास्तुशिल्प पर इस्लाम प्रभाव दिखायी देता है। विभिन्न सुल्तानों व मुगलों के समय बनी हुई इमारतों में भारतीय वास्तुकला का समन्वय ईरानी तुर्की व अन्य इस्लामी देशों में प्रचलित वास्तुकला व शैलियों के साथ हुआ। इस्लामी वास्तुकला में मुख्यतः मस्जिद, मकबरे, महल तोरण, गुम्बद, मेहराब तथा मीनारों का निर्माण किया गया। महरौली की कुब्बतुल इस्लाम मस्जिद, कुतुबमीनार, कुतुबी मस्जिद, अलाई दरवाजा, गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा, फिरोजशाह कोटला आदि भवनों का निर्माण सल्तनत काल में हुआ। इसी प्रकार हुमायूँ का मकबरा, आगरा का किला, फतेहपुर सीकरी के अगणित भवनों (विशेषकर बुलन्द दरवाजा, शेख चिश्ती का मकबरा, पंचमहल) मोती मस्जिद, लाल किला, जामा मस्जिद, ताजमहल आदि अद्वितीय भवनों का निर्माण मुगलकाल में हुआ।

मुगलकालीन भवन अपने रंग-बिरंगे टाइलों, महराबों, गुम्बद, ऊँची मीनारों, फूल-पत्तियों व ज्यामितीय के नमूनों के कारण प्रसिद्ध हैं। ये भवन सुन्दर, सफेद संगमरमर से निर्मित होने, बगीचों, दोहरे गुम्बदों, ऊँचे द्वार पथी, शानदार विशाल हॉलों के कारण विश्व प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 2.
प्राचीनकाल से लेकर मध्यकाल तक साहित्य का विकास किस प्रकार हुआ? लिखिए। (2009, 12)
उत्तर:
साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है। भारत का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही उसका साहित्य समृद्धशाली है। भारतीय साहित्य के केन्द्र में संस्कृत साहित्य का अपार भण्डार है।

प्राचीन भारत में साहित्य का अपूर्व विकास हुआ। जिस समय अमेरिका, इंग्लैण्ड तथा पश्चिम के अनेक देशों में लोग पशुवत् असभ्यता का जीवन व्यतीत कर रहे थे, उसी समय भारत में वेदों की रचना हुई थी। वेदों की संख्या चार है-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। इसके अतिरिक्त आरण्यक व उपनिषदों की रचना हुई। वैदिक काल के पश्चात् रामायण, महाभारत तथा भगवद्गीता जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे गये। गुप्तकाल में साहित्य का सर्वाधिक विकास हुआ। इस काल में धर्मशास्त्र पर अनेक ग्रन्थ लिखे गये जिसमें स्मृति साहित्य, याज्ञवलक्य स्मृति, नारद स्मृति, काव्यायन स्मृति प्रमुख हैं।

कालिदास इस काल के प्रमुख साहित्यकार थे, उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रं, मेघदूत, विक्रमोर्वशीयम्, कुमारसंभव, रघुवंश, ऋतुसंहार। इसके अतिरिक्त इस काल के प्रमुख साहित्यकार विशाखदत्त, शूद्रक, विष्णु शर्मा व आर्यभट्ट थे। हर्षवर्धन काल के प्रमुख विद्वान् बाणभट्ट थे जिन्होंने कादम्बरी की रचना की। राजपूत काल में भी साहित्य के सृजन का कार्य उन्नति की ओर अग्रसर था। राजा मुंज, भोज, अमोघवर्ष आदि प्रमुख साहित्यकार थे। इस समय चिकित्सा, ज्योतिष, व्याकरण, वास्तुकला आदि विषयों पर ग्रन्थ लिखे गये।

मध्यकाल में साहित्य का विकास क्रम चलता रहा। इस काल का साहित्य सल्तनत एवं मुगलकालीन व्यवस्थाओं पर प्रकाश डालता है। तत्काली समय में व्यक्तिवादी इतिहास में लेखन कार्य प्रारम्भ हो चुका था। सल्तनत काल में धार्मिक एवं धर्म निरपेक्ष साहित्य का सृजन किया गया। अमीर खुसरो द्वारा रचित दोहे और पहेलियाँ आज भी लोकप्रिय हैं। मुगलकाल में कई भाषाओं का विकास हुआ। हिन्दी भाषा में कबीर, जायसी, सूरदास, तुलसीदास की रचनाओं का विशेष महत्त्व है। जबकि मीराबाई ने राजस्थानी व मैथिली भाषा का प्रयोग किया है। बंगाल में रामायण और महाभारत का संस्कृत से बंगाली भाषा में अनुवाद किया गया।

इस काल में फारसी तथा तुर्की भाषा में भी रचनाएँ लिखी गयीं। मुगलकाल में ही उर्दू साहित्य का विकास हुआ। प्रारम्भ में उर्दू को ‘जबान-ए-हिन्दर्वा’ कहा जाता था। अकबर द्वारा संस्कृत भाषा के अनेक ग्रन्थों का अनुवाद फारसी भाषा में करवाया गया था। इस प्रकार मध्यकाल में साहित्य का विकास विभिन्न प्रकार से होता रहा।

प्रश्न 3.
प्राचीनकाल से लेकर मध्यकाल तक की चित्रकला की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
चित्रकला का विकास मानव के विचारों की अभिव्यक्ति के चित्रात्मक स्वरूप पर आधारित है। विभिन्न कालों में चित्रकला का अंकन तत्कालीन समाज के चित्रकारों द्वारा किया गया।

सिन्धु सभ्यता में चित्रकला के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। इस काल में प्राप्त बर्तनों एवं मोहरों पर अनेक चित्र मिलते हैं। भवनों पर चित्रकारी और रंगों का प्रयोग भी किया जाता था। वैदिक काल में मन की अभिव्यक्ति को दीवारों के साथ-साथ बर्तनों तथा कपड़ों पर कढ़ाई के रूप में अंकित किया जाता था। मौर्यकाल में चित्रकला का विकास लोककला के रूप में हुआ। मौर्यकालीन भवनों एवं प्रासादों के स्तम्भों पर चित्रकारी की जाती थी। अजन्ता की गुफाओं के कुछ चित्र ई. पू. प्रथम शताब्दी के हैं। यहाँ स्थित गुफा संख्या 10 में छद्दत जातक का चित्रांकन विशेष है। चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हमें गुप्तकाल में दिखाई देते हैं।

अजन्ता की गुफाओं के चित्र मुख्यतः धार्मिक विषयों पर आधारित हैं। इनमें बुद्ध और बोधिसत्व के चित्र हैं। इस काल की चित्रकला बाघ (म. प्र. में धार जिले में) की गुफाओं में दिखाई देती है। हर्ष के समय में कपड़ों पर चित्रकारी की जाती थी। विवाह कार्यों में मांगलिक दृश्यों का अंकन किया जाता था व महिलाओं द्वारा कच्ची मिट्टी के बर्तन को अलंकृत किया जाता था। राजपूत काल में चित्रकला पूर्णतः विकसित हो चुकी थी। इस काल में गुजरात शैली और राजपूताना शैली विकसित हो गयी थीं। मन्दिरों और राजमहलों को सजाने के लिये भित्ति चित्र बनाये जाते थे। लघु चित्रों को बनाने की कला भी इसी काल से शुरू हुई थी।

मध्यकालीन चित्रकला :

  1. यहाँ धार्मिक जनजीवन से सम्बन्धित चित्र प्रस्तुत किये।
  2. मालवा और राजस्थानी चित्रकला शैलियों का विकास हुआ।
  3. गुजरात में जैन मुनियों द्वारा ताड़पत्र पर लिखे हुए ग्रन्थों में उच्चकोटि के छोटे-छोटे चित्र बनाये गये।
  4. मुगलकालीन चित्रों की विशेषता है-विदेशी पेड़-पौधों और उनके फूल-पत्तों, स्थापत्य अलंकरण की बारीकियाँ साज समान के साथ स्त्री आकृतियाँ, अलंकारिक तत्वों के रूप में विशिष्ट राजस्थानी चित्रकला।
  5. जहाँगीर के काल में छवि चित्र (व्यक्तिगत चित्र) प्राकृतिक दृश्यों एवं व्यक्तियों के सम्बन्धित चित्रण की पद्धति आरम्भ हुई।
  6. शाहजहाँ के काल में चित्रों में रेखांकन और बॉर्डर बनाने में विशेष प्रगति हुई।

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प्रश्न 4.
मुगलकालीन स्थापत्य कला का वर्णन कीजिए।(2008, 09, 13, 17)
उत्तर:
मुगलकालीन स्थापत्य कला के अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं। मुगलकालीन स्थापत्य कला की प्रमुख विशेषताएँ हैं-गोल गुम्बद, पतले स्तम्भ तथा विशाल खुले प्रवेश द्वार।

बाबर द्वारा भवन निर्माण :
बाबर का अधिकांश समय युद्ध करने में ही व्यतीत हुआ। उसे भवन बनवाने का समय नहीं मिला। जो भवन उसने बनवाये हैं, उनमें से मात्र दो ही भवन शेष हैं –

  1. पानीपत के काबुली बाग में स्थित मस्जिद
  2. रुहेलखण्ड में स्थित मस्जिद।

हुमायूँ द्वार भवन निर्माण :
हुमायूँ का शासनकाल स्थापत्य कला की दृष्टि से साधारण है। उसे भी नवीन इमारतें बनवाने का समय नहीं मिल सका। दिल्ली में उसने दीनपनाह नामक महल का निर्माण करवाया था जो शेरशाह द्वारा नष्ट कर दिया गया। आगरा और फतेहाबाद (हिसार) में दो मस्जिदों का निर्माण भी करवाया था।

शेरशाहकालीन स्थापत्य कला :
शेरशाह महान् प्रशासक होने के साथ-साथ एक महान् निर्माता भी था। उसके शासन काल की प्रमुख इमारते हैं –

  1. दिल्ली के समीप पुराने किले की मस्जिद
  2. सहसराम का मकबरा। इसमें सहसराम का मकबरा प्रसिद्ध है।

इसका निर्माण बड़े आकर्षक और प्रभावशाली ढंग से किया गया है।

अकबरकालीन स्थापत्य कला :
मुगलकालीन स्थापत्य कला का वास्तविक प्रारम्भ अकबर के शासन से होता है। इसके शासनकाल में अनेक विशाल और भव्य इमारतों का निर्माण हुआ। अकबरकालीन भवनों में हिन्दू स्थापत्य कला का प्रभाव अत्यधिक दृष्टिगोचर होता है। अकबर द्वारा निर्मित प्रमुख भवन निम्न हैं-हुमायूँ का मकबरा, आगरे का लाल किला, जहाँगीरी महल, अकबरी महल, फतेहपुर सीकरी (दीवाने-आम, दीवाने-खांस, बीरबल का महल, मरियम भवन, जामा मस्जिद, बुलन्द दरवाजा, सलीम चिश्ती का मकबरा) आदि। फतेहपुर सीकरी का बुलन्द दरवाजा स्थापत्य कला का एक भव्य तथा आश्चर्यजनक उदाहरण है। यह दरवाजा सड़क से 176 फीट ऊँचा है तथा सीढ़ियों से इसकी ऊँचाई 134 फीट है।

जहाँगीरकालीन स्थापत्य कला :
जहाँगीर को स्थापत्य कला की अपेक्षा चित्रकला से अधिक प्रेम था, अतः उसके शासन काल में अधिक भवनों का निर्माण नहीं हुआ। परन्तु जो भवन बने वे सुन्दर और आकर्षक हैं। ये निम्न हैं-अकबर का मकबरा सिकन्दरा, मरियम की समाधि, एत्माद्उद्दौला का मकबरा। इनमें एत्मादद्दौला का मकबरा सबसे आकर्षक है।

शाहजहाँकालीन स्थापत्य कला :
मुगलकालीन स्थापत्य कला का चरम विकास शाहजहाँकालीन इमारतों में झलकता है। शाहजहाँ की सर्वश्रेष्ठ कृति ताजमहल है। इसका निर्माण उसने अपनी प्रिय बेगम मुमताज महल की यादगार में किया था। इसके बनने में लगभग 22 वर्ष लगे तथा 50 लाख रुपये खर्च हुये। शाहजहाँ के काल को मुगल स्थापत्य कला का स्वर्ण युग कहा जाता है। इस काल की प्रमुख विशेषताएँ थीं-नक्काशी युक्त मेहराबें, बंगाली शैली में मुड़े हुए कंगूरे तथा जंगले के खम्भे। शाहजहाँ की अन्य प्रसिद्ध इमारतें दिल्ली का लाल किला, दीवाने खास और जामा मस्जिद।

औरंगजेबकालीन स्थापत्य कला :
औरंगजेब शुष्क और नीरस स्वभाव का था। उसे स्थापत्य कला से विशेष प्रेम नहीं था। अत: उसके शासनकाल में बहुत कम इमारतें बनीं और जो भी बनीं वे अत्यन्त घटिया किस्म की थीं।

प्रश्न 5.
मध्यकाल में मूर्तिकला का विकास किस प्रकार हुआ? लिखिए। (2008, 09, 12)
उत्तर:
मध्यकाल में दक्षिण भारत में मूर्तिकला का अभूतपूर्व विकास हुआ। मन्दिरों के बाह्य व अंतरंग भागों को अलंकृत करने के लिए तक्षण शिल्प व मूर्तिशिल्प का उपयोग किया गया। इस्लाम धर्म मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करता था। ऐसे में मध्यकालीन मूर्तिकला पर उसका प्रभाव पड़ा। मुगलकाल में इस कला की विशेष उन्नति नहीं हुई। अकबर के समय मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। उसने चित्तौड़ के जयमल और पत्ता की हाथियों पर सवार मूर्तियाँ बनवायीं और उन्हें आगरा के किले के फाटक पर रखवा दिया। जहाँगीर शासनकाल में भी मूर्तिकला को प्रोत्साहित किया गया। आगरा किले में झरोखा दर्शन के नीचे अमरसिंह व कर्णसिंह की मूर्तियाँ लगायी गयीं। फतेहपुर सीकरी में महल के हाथी द्वार पर दो विशालकाय हाथियों की टूटी हुई मूर्तियाँ अब भी विद्यमान हैं।

जहाँगीर ने उदयपुर के राणा अमरसिंह एवं उनके पुत्र कर्णसिंह की मूर्तियाँ आगरा के महलों के बाग में रखवायीं। शाहजहाँ के समय मूर्तिकला को प्रोत्साहन नहीं दिया। औरंगजेब शुष्क और नीरस स्वभाव का था उसे मूर्तिकला से विशेष प्रेम नहीं था। इसलिये उसके शासनकाल में मूर्तिकला के विकास में उदासीनता आ गई। कुल मिलाकर मध्यकाल में मूर्ति के विकास को प्रोत्साहन नहीं मिला जिसके चलते मूर्तिकला प्रभावित हुई।

प्रश्न 6.
मध्यकाल में नृत्य व संगीत के विकास व उसके प्रभाव का समीक्षात्मक विवरण दीजिए।
उत्तर:
संगीत के विषय में मध्ययुगीन हिन्दू शासकों की विशेष रुचि रही है। नृत्य संगीत से सम्बन्धित कुछ ग्रन्थ लिपिबद्ध हो चुके थे, इससे भोज, सोमेश्वर और सारंगदेव का संगीत रत्नाकर बहुत प्रसिद्ध ग्रन्थ है। बाद में संगीत के कई अन्य ग्रन्थ भी रचे गये। तेरहवीं सदी में जयदेव द्वारा रचित ‘गीत गोविन्द’ इसी दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। मध्यकाल में भक्ति संगीत को अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ। मीराबाई, तुलसीदास, कबीरदास और सूरदास के भजनों को लोग मन लगाकर गाते थे।

सल्तनत काल में नये रागों एवं वाद्य यन्त्रों से हिन्दुस्तानी संगीत का परिचय हुआ। यद्यपि मुस्लिमों के प्रसिद्ध ग्रन्थ कुरान में संगीत को वर्जित माना जाता है। परन्तु समय-समय पर सुल्तानों, सामन्तों व खलीफाओं ने नृत्य-संगीत को प्रोत्साहन दिया। सल्तनत काल का प्रसिद्ध संगीतकार अमीर खुसरो था जिसने अपनी पुस्तक ‘नूरह सिपहर’ में संगीत की व्याख्या की है। इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि भारतीय संगीत केवल मनुष्य मात्र को ही प्रभावित नहीं करता वरन् यह पशुओं तक को मन्त्रमुग्ध कर देता है। अमीर खुसरो ने भारतीय-ईरानी संगीत सिद्धान्तों के मिश्रण से कुछ नवीन रागों का आविष्कार किया। अमीर खुसरो को ‘कब्बाली का जनक’ माना जाता है। उस काल में ख्याल तराना आदि संगीत की नवीन विधाओं के कारण संगीत का रूप परिवर्तित हो गया। नृत्य-संगीत उस काल में मनोरंजन का प्रमुख साधन था।

मुगलकाल में नृत्य संगीत कला फली-फूली। मुगल बादशाह संगीत प्रेमी होते थे। प्रत्येक राजकुमार को संगीत को विधिवत् शिक्षा दी जाती थी। बाबर स्वयं संगीत प्रेमी था। वह स्वयं गीतों का रचयिता था। उसके बनाये हुए गीत बहुत समय तक प्रचलित रहे। हुमायूँ व शेरशाह सूरी को भी संगीत का बड़ा शौक था। मुगल सम्राट अकबर ने अपने दरबार में संगीतज्ञों को प्रश्रय दिया। अकबर स्वयं नक्कारा बजाने में माहिर था। संगीतशास्त्र में उसकी बहुत रुचि थी। अकबर के दरबार में नवरत्नों में से एक रत्न तानसेन था जो उस काल का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार था। अबुल फजल के अनुसार उस जैसा गायक न तो है और न ही होगा।

तानसेन के गुरु बाबा हरिदास थे। तानसेन के अतिरिक्त 36 अन्य गायकों को भी अकबर के दरबार में संरक्षण मिला हुआ था। तत्कालीन समय में संगीत के संस्कृत ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद किया गया। अकबर के काल में ध्रुपद गायन की चार शैलियाँ प्रचलन में थीं। मुगलकाल में जहाँगीर के दरबार में खुर्रमदाद, मक्खू, चतुरखाँ और हमजा आदि संगीतज्ञ थे। इसी प्रकार शाहजहाँ के दरबार में रामदास, जगन्नाथ, सुखसैन और लाल खाँ आदि प्रमुख संगीतज्ञ थे। औरंगजेब संगीत कला का विरोधी था। अत: मुगलकालीन संगीत का विकास शाहजहाँ के पश्चात् रुक गया।

मध्यकाल में भारतीय नृत्य की शास्त्रीय शैलियाँ दिखाई देती रहीं। इनमें भरतनाट्यम्, कुचीपुड़ी, कत्थकली आदि शास्त्रीय शैलियों के नृत्य दक्षिण भारतीय क्षेत्रों में प्रचलित रहे हैं। भरतनाट्यम् व कुचीपुड़ी नृत्य कृष्णलीला पर आधारित होते थे। जबकि कत्थक नृत्य उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब व मध्य प्रदेश तक सीमित था। इसमें कृष्ण लीलाओं तथा अन्य पौराणिक कथाओं पर आधारित नृत्य किये जाते थे। दरबारों में नृत्य संगीत चलता था जो कि मनोरंजन का प्रमुख साधन था।

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प्रश्न 7.
ललित कलाओं का विकास प्राचीनकाल से मध्यकाल तक किस प्रकार हुआ ? लिखिए।
उत्तर:
अन्य ललित कलाओं में नाट्य, रंगोली व वनवासी कलाओं को शामिल किया जाता है। भारतीय परम्पराओं में इसका प्रचलन अत्यन्त प्राचीन काल से है।
सिन्धु सभ्यता में ललित कला :
सिन्धु सभ्यता में ललित कलाएँ प्रचलन में थीं। सिन्धु सभ्यता के राखीगढ़ी से प्राप्त ऊँचे चबूतरे पर बनायी गयी अग्निवेदिकाएँ, कालीबंगा के फर्श की अलंकृत ईंटें, पक्की मिट्टी की जालियाँ, मूर्तियाँ, अलंकृत आभूषण, बर्तनों पर चमकदार लेप, पशु-पक्षियों का अंकन, मंगल चिह्न स्वास्तिक, सूर्य आकृति आदि से ललित कलाओं के प्रचलन की जानकारी प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त उस काल में थियेटर की जानकारी भी मिलती है। जिसका उपयोग मुख्यतः नाट्य व नृत्य संगीत के लिये किया जाता होगा।

वैदिक काल में ललित कला :
वैदिक काल में भी ललित कलाओं का उल्लेख प्राप्त होता है। वैदिक काल में लौकिक धर्म के विकास के साथ-साथ लोक संस्कृति का भी विकास हुआ। इस काल में प्रमुखतया मंगल चिह्नों, भवनों की सजावट, जादू कला, यज्ञ वेदिकाओं आदि के उल्लेख मिलते हैं।

मौर्यकाल में ललित कला :
मौर्यकाल में लोक कलाओं का प्रचलन था। तमाशे दिखाकर लोग जनता का मनोरंजन करते थे। यह काल नट (मदारी), विभिन्न प्रकार की बोलियाँ बोलकर मनोरंजन करने वालों, रस्सी पर नाचने वालों और रंगमंच पर अभिनय कर जीवन-यापन करने वालों का था।

गुप्तकाल में ललित कला :
गुप्तकाल में ललित कलाओं का प्रचलन रहा। गुप्तकालीन सिक्कों पर सुन्दर चित्रण इस कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। काष्ठ शिल्प, पाषाण शिल्प, धातु शिल्प, ताबीज, हाथी दाँत शिल्प, आभूषण आदि तत्कालीन ललित कलाओं के परिचायक हैं। गुहा मन्दिरों में अलंकरण, दीवारों पर चित्रकारी, प्रेक्षणिकाएँ, चमर दुलाते द्वारपाल, मूर्तियों में केश सज्जा, यक्ष, पशु-पक्षी, नदी, झरनों का अंकन आदि ललित कलाओं के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। तत्कालीन समय में नाट्यशालाओं के लिये प्रेक्षागृह तथा रंगशाला जैसे शब्दों का उल्लेख मिलता है।

पूर्वमध्यकाल में ललित कला :
पूर्वमध्यकाल में नट, जादूगर, हाथी दाँत के कारीगर आदि का उल्लेख कला सौन्दर्य के सन्दर्भ में मिलता है। मन्दिरों की दीवारें पर बनी मूर्तियाँ राग-रागिनी, नायक-नायिकाओं का चित्रण, पादप-पत्रों, पुष्पों व पशुओं का चित्रण, लोक चित्रण आदि इस काल की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ हैं। पूर्व मध्यकाल में विभिन्न ऐतिहासिक व पौराणिक नृत्य नाटिकाएँ भी ललित कला में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

मध्यकाल में ललितकला :
मध्यकाल में ललितकलाओं का अभूतपूर्व विकास हुआ। वृन्दावन, मथुरा आदि में रासलीलाओं का मंचन किया जाता था। इस समय महाकाव्यों के अतिरिक्त ऐतिहासिक पात्रों पर भी नाटिकाओं का मंचन किया जाता था। विजय नगर के शासक हरिहर द्वितीय के पुत्र वीरू दादा ने ‘नारायण विलास’ नामक नाटक की रचना की, साथ ही उन्मत्तराघव एकांकी भी लिखा। महाकवि बाणभट्ट ने ‘कुमार संभव’ तथा रामचन्द्र ने ‘जगन्नाथवल्लभ’ की रचना की। मध्यकाल में नाटकों के मंचन में सामाजिक व धार्मिक नाटकों को प्राथमिकता प्रदान की जाती थी। उस काल में सुलेख कला भी विकसित हुई। इसके अतिरिक्त अलंकृत बर्तन, अलंकृत दीवारें, महल, मीनारें, मकबरे आदि पर नक्काशीदार जालियाँ, जरी के कपड़े, कशीदाकारी, पच्चीकारी कला, नक्काशीदार फब्बारे आदि तत्कालीन ललित कलाओं के अभूतपूर्व उदाहरण हैं।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 11 अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न

MP Board Class 9th Social Science Chapter 11 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रामायण की रचना किसने की थी?
(i) महर्षि वाल्मिकी
(ii) महर्षि वेद व्यास
(iii) महर्षि पतंजलि
(iv) महर्षि कालिदास।
उत्तर:
(i) महर्षि वाल्मिकी

प्रश्न 2.
नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना किस काल में हुई थी?
(i) गुप्तकाल
(ii) मौर्यकाल
(iii) वैदिक काल
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(i) गुप्तकाल

रिक्त स्थान पूर्ति

  1. नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना ………… काल में हुई थी।
  2. भोपाल के निकट ………… शैलाश्रय है। (2012)
  3. माउण्ट आबू का …………. मन्दिर बहुत प्रसिद्ध है।
  4. बौद्ध ग्रन्थ ‘मिलिन्द के प्रश्न’ की रचना ………… ने की।
  5. आर्यभट्टीयम् पुस्तक गुप्तकाल में …………. के द्वारा लिखी गयी। (2009)
  6. रामायण और महाभारत भारतवर्ष के दो ………… हैं। (2013)

उत्तर:

  1. गुप्तकाल
  2. भीमबेटका
  3. दिलवाड़ा
  4. नागसेन
  5. आर्यभट्ट
  6. महाकाव्य।

सत्य/असत्य

प्रश्न 1.
सामवेद विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ है। (2008)
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 2.
प्रथम नगरीकरण गुप्तकाल में हुआ था। (2008)
उत्तर:
असत्य

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प्रश्न 3.
प्रारम्भ में उर्दू को जबान-ए-हिन्द कहा जाता था। (2011)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 4.
कब्बाली का जनक अमीर खुसरो था। (2010)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 5.
नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना मौर्य काल में हुई। (2009)
उत्तर:
असत्य

प्रश्न 6.
कम्बन नामक कवि ने तमिल ‘रामायण’ की रचना की। (2014)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 7.
सिंधु सभ्यता में लिपि का ज्ञान था। (2015)
उत्तर:
सत्य

प्रश्न 8.
वैदिक काल साहित्य सृजन की दृष्टि से समृद्ध है। (2017)
उत्तर:
सत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 11 प्रमुख सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ

उत्तर:

  1. → (ग)
  2. → (घ)
  3. → (क)
  4. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

प्रश्न 1.
भिक्षुओं के रहने के मठ।
उत्तर:
बिहार

प्रश्न 2.
अशोक के अभिलेख किन प्रमुख लिपियों में हैं?
उत्तर:
ब्राह्मी एवं खरोष्ठि लिपि

प्रश्न 3.
पाली और संस्कृत भाषा का विकास किस धर्म में हुआ?
उत्तर:
बौद्ध धर्म

प्रश्न 4.
श्रोतसूत्र का विषय क्या है? (2016)
उत्तर:
यज्ञ

प्रश्न 5.
मौर्यकालीन सामूहिक पूजा के मन्दिर। (2008)
उत्तर:
चैत्य।

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MP Board Class 9th Social Science Chapter 11 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांस्कृतिक प्रवृत्तियों से क्या आशय है?
उत्तर:
सांस्कृतिक प्रवृत्तियों से आशय भारतीय संस्कृति के स्वरूप से है। जिसमें साहित्य, चित्रकला, वास्तुकला, मूर्तिकला, नृत्य एवं संगीत तथा अन्य ललित कलाएँ शामिल हैं।

प्रश्न 2.
साहित्य क्या है?
उत्तर:
साहित्य समाज का दर्पण है। भारत का इतिहास जितना गौरवशाली है उतना ही साहित्य समृद्धशाली है। भारतीय साहित्य के केन्द्र में संस्कृत साहित्य का अक्षय भण्डार है।

प्रश्न 3.
महाकाव्य कालीन काल में किन ग्रन्थों की रचना की गयी थी?
उत्तर:
महाकाव्य कालीन काल में रामायण एवं महाभारत ग्रन्थों की रचना की गयी थी।

प्रश्न 4.
मौर्यकालीन साहित्य में कौन-सी दो लिपियाँ प्रयोग में लायी जाती थीं?
उत्तर:
मौर्यकालीन साहित्य में ब्राह्मी एवं खरोष्ठि लिपियाँ प्रयोग में लायी जाती थीं।

प्रश्न 5.
पतंजलि कौन थे?
उत्तर:
शुंग सातवाहन के काल में पतंजलि जैसे विद्वान हुए, इन्होंने पाणिनी की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य लिखा व संस्कृत भाषा के नियमों को संशोधित रूप में प्रस्तुत किया।

प्रश्न 6.
गुप्तकाल में शिक्षा के प्रमुख केन्द्र कौन से थे?
उत्तर:
गुप्तकाल में शिक्षा के प्रमुख केन्द्र काशी, मथुरा, अयोध्या, पाटलिपुत्र आदि थे।

प्रश्न 7.
शून्य के सिद्धान्त का प्रारम्भ और दशमलव प्रणाली के विकास का श्रेय किस युग के गणितज्ञों को है?
उत्तर:
शून्य के सिद्धान्त का प्रारम्भ और दशमलव प्रणाली के विकास का श्रेय गुप्त युग के गणितज्ञों को है।

प्रश्न 8.
बाणभट्ट ने किन दो महान् ग्रन्थों की रचना की?
उत्तर:
बाणभट्ट ने दो महान् ग्रन्थों-

  1. हर्षचरित्र, तथा
  2. कादम्बरी की रचना की।

प्रश्न 9.
कुषाण काल में मूर्तिकला की किन दो शैलियों का विकास हुआ ?
उत्तर:
कुषाण काल में मूर्तिकला की दो प्रमुख शैलियों का विकास हुआ-गान्धार शैली और मथुरा शैली।

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प्रश्न 10.
अकबरकालीन स्थापत्य कला की प्रमुख इमारतें कौन-सी हैं?
उत्तर:
फतेहपुर सीकरी का दीवाने आम, दीवाने खास, आगरा का किला, जोधाबाई का महल, पंचमहल, जामा मस्जिद, बुलन्द दरवाजा आदि अकबरकालीन स्थापत्य कला की प्रमुख इमारतें हैं।

MP Board Class 9th Social Science Chapter 11 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांस्कृतिक प्रवृत्तियों से क्या आशय है? (2008)
उत्तर:
सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ हमें प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर से परिचित कराती हैं। किसी भी देश का इतिहास तभी महत्त्वपूर्ण होता है जब उसके सांस्कृतिक प्रतिमानों का अध्ययन वैज्ञानिक आधार पर किया जाए। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। भारत प्राचीनकाल से विश्व भर में अपनी समृद्ध संस्कृति के लिये जाना जाता रहा है। इसकी प्रमुख विशेषता निरन्तरता के साथ पुरातनता, अध्यात्मवाद, एकीकरण व समन्वय की शक्ति आदि है। भारतीय संस्कृति मानव समाज की अमूल्य निधि है।

प्रश्न 2.
“वैदिक काल साहित्य सृजन की दृष्टि से समृद्ध है।” व्याख्या करें। (2008)
उत्तर:
वैदिक काल साहित्य सृजन की दृष्टि से समृद्ध है। इस काल की साहित्यिक रचनाओं में प्राचीन जीवन मूल्यों का सजीव वर्णन किया गया है। वैदिक साहित्य में वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक, उपनिषद्, वेदांग, सूत्र, महाकाव्य स्मृति ग्रन्थ, पुराण आदि आते हैं। वेदों की संख्या चार हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वैदिक साहित्य का सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद हैं।

महाकाव्य कालीन समय में रामायण एवं महाभारत जैसे ग्रन्थों की रचना की गई जिसमें उस समय का सामाजिक एवं राजनीतिक चित्रण मिलता है। रामायण की रचना महर्षि वाल्मिकी द्वारा एवं महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी।

प्रश्न 3.
बौद्ध साहित्य के बारे में वर्णन कीजिए।
अथवा
बौद्ध धर्म में ‘त्रिपिटकाएँ यानि तीन टोकरियाँ’ का क्या आशय है ?
उत्तर:
बौद्ध धर्म में पाली और संस्कृत भाषाओं को अत्यधिक समृद्ध किया है। बौद्ध धर्म ने त्रिपिटकाएँ यानि तीन टोकरियाँ-विनयपटिक, सूतपिटक और अभिधम्मपिटक। विनय-पिटक में दैनिक जीवन के नियम व उपनियम हैं। सूतपिटक में नैतिकता और चार महासत्यों पर बुद्ध के संवाद और संभाषण संग्रहीत हैं। अभिधम्मपिटक में दर्शन और तत्व संग्रहीत हैं। बौद्ध साहित्य में दीपवंश, महावंश, दिव्यावदान, मिलिन्द पन्हों, महोबोधि वंश, महावंश टीका, आर्य मंजूश्री मूलकल्प आदि शामिल हैं।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित साहित्यकारों की एक-एक मुख्य रचना का नाम लिखिएभारवि, माघ, कल्हण, विल्हण, परिमल, बल्लाल, हरिषेण, वज्जिका, वराहमिहिर।
उत्तर:
साहित्यकार – रचना
1. भारवि – किरातार्जुनीय
2. माघ – शिशुपाल वध
3. कल्हण – राज तरंगिणी
4. विल्हण – विक्रमांक चरित्र
5. परिमल – नवसाहसांक चरित्र
6. बल्लाल – भोज प्रबन्ध
7. हरिषेण – प्रयाग प्रशस्ति लेख
8. वज्जिका – कौमुदी महोत्सव
9. वराहमिहिर – वृहत्संहिता

प्रश्न 5.
कालिदास की प्रमुख रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
कालिदास की प्रमुख रचनाएँ अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्र, मेघदूत, विक्रमोर्वशीयम, कुमारसम्भव, रघुवंश, ऋतुसंहार आदि हैं।

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प्रश्न 6.
राजपूतकालीन चित्रकला की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2008)
उत्तर:
राजपूत काल में चित्रकला पूर्ण विकसित स्वरूप में आ चुकी थी। इस काल में चित्रकला की अनेक क्षेत्रीय शैलियाँ विकसित हो चुकी थीं; जैसे-गुजरात शैली, राजपूताना शैली। गुजरात शैली में जैन जीवन पद्धति एवं धर्म से सम्बन्धित चित्र हैं। राजपूताना शैली में राधाकृष्ण की रास लीला व नायक-नायिका के भेद सम्बन्धित चित्र हैं। मन्दिरों और राजमहलों को सजाने के लिये भित्ति चित्र बनाये जाते थे। लघु चित्रों को बनाने की कला भी इसी काल से प्रारम्भ हुई। पुस्तकों को आकर्षक बनाने के लिये यह चित्र बनाये जाते थे।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित राजपूतकालीन प्रमुख मन्दिर कहाँ स्थित हैं?
कन्दरिया महादेव, दिलवाड़ा मन्दिर, लिंगराज मन्दिर, मुक्तेश्वर मन्दिर, सूर्य मन्दिर, महाबलिपुरम् और वृहदीश्वर मन्दिर।
अथवा
राजपूतकालीन किन्हीं चार मन्दिरों के नाम एवं उनके स्थान बताइए। (2010, 15)
उत्तर:
राजपूतकालीन प्रमुख मन्दिर

MP Board Class 9th Social Science Solutions Chapter 11 प्रमुख सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ


प्रश्न 8.
सिन्धु सभ्यता में मूर्ति शिल्प की विशेषताएँ बताइए। (2011)
उत्तर:
सिन्धु सभ्यता में धातु की मूर्तियों का चलन शुरू हो चुका था। मोहनजोदड़ो से एक नर्तकी की कांस्य मूर्ति मिली है। इसी सभ्यता का एक कांस्य रथ मूर्ति के रूप में मिला है। दो पहिए वाले रथ को दो बैल खींच रहे हैं। इसी समय की अन्य मूर्तियों में हाथी, गैंडा, कूबड़दार बैल सर्वाधिक प्राप्त हैं। अन्य पशु-मूर्तियों में कुत्ता, भेड़, सुअर, बन्दर और अन्य पशु-पक्षियों का अंकन मोहरों पर मिलता है। सिन्धु सभ्यता में मृणमूर्तियाँ बहुत मिलती हैं। सिन्धु सभ्यता की मोहरें वर्गाकार, आयतकार व बटन के आकार की हैं। ये गोमेद, चर्ट और मिट्ठी की हैं। लोथल के देसलपुर से ताँबे की मोहर भी प्राप्त हुई हैं। इसमें एक चौकी पर पशुपति शिव आसीन हैं जिनके आस-पास हाथी, चीता, गैंडा, भैंस आदि का अंकन मिलता है।

प्रश्न 9.
गुप्तकाल साहित्य का स्वर्ण युग था। कारण बताइए। (2009)
उत्तर:
गुप्तकाल साहित्य का स्वर्ण युग-गुप्त शासकों के शासन काल में साहित्य जिस रूप में पुष्पित-फलित हुआ, वह अद्वितीय है। इस काल में ज्ञान-विज्ञान की अनेक विधाओं में साहित्य सृजन किया गया। स्मृति साहित्य का सृजन इसी काल में किया गया। याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति, कात्यायन स्मृति आदि प्रमुख हैं। रामायण तथा महाभारत को गुप्तकाल में लिपिबद्ध किया गया। बौद्ध दार्शनिक असंग ने महायानसूत्रानंकार व योगाचार भूमिशास्त्र, वसुबंध ने अभिधर्म कोष की रचना की। जैन लेखकों में जिनचन्द्र, सिद्धसेन, देवनन्दिन आदि प्रमुख हैं। गुप्तकालीन साहित्य को देखकर प्रतीत होता है कि उस युग में प्रचलित शिक्षा पद्धति उत्तम रही होगी। नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना इसी काल में हुई थी। इसीलिए गुप्तकाल साहित्य का स्वर्ण युग था।

प्रश्न 10.
“सिन्धु सभ्यता में नृत्य संगीत की परम्परा थी।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत में नृत्य संगीत की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। नृत्य के माध्यम से कलाकार अपनी कला को प्रकट करता है। जबकि संगीत का उपयोग मनोरंजन के साथ-साथ धार्मिक एवं सांस्कृतिक अवसरों पर किया जाता है।

सिन्धु सभ्यता में नृत्य संगीत की परम्परा थी, इसके स्पष्ट प्रमाण भी उपलब्ध हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त कांस्य नर्तकी की प्रतिमा इस बात की पुष्टि करती है कि तत्कालीन समय में नृत्यकला, मनोरंजन आदि भाव एवं मोहरों पर ढोलक का अंकन प्राप्त होता है, जो उस समय संगीत के होने का प्रमाण देती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सिन्धु सभ्यता में नृत्य तथा संगीत कला लोकप्रिय रही होगी।

प्रश्न 11.
गुप्तकाल में नृत्य-संगीत कला का वर्णन कीजिए। (2008, 09)
उत्तर:
गुप्तकाल में नृत्य-संगीत विधा का बहुत विकास हुआ। तत्कालीन समय में वसन्तोत्सव, कौमुदी महोत्सव, दीपोत्सव आदि पर नृत्य-संगीत का प्रचलन था। उस काल में गणिकाओं का उल्लेख मिलता है जिनका प्रमुख कार्य नृत्य और गायन था। गुप्त शासकों द्वारा कलाकारों को प्रश्रय देने की जानकारी भी मिलती है। समुद्रगुप्त स्वयं एक श्रेष्ठ वीणावादक थे इसलिये अपनी स्मृति को जीवित रखने के लिये उन्होंने वीणाधारी प्रकार के सिक्कों को चलवाया। गुप्तकालीन वाघ की गुफाओं में नृत्य-संगीत का एक महत्त्वपूर्ण चित्र मिलता है जो तत्कालीन समय में नृत्य-संगीत के वैभव के परिचायक हैं। मालविकाग्निमित्र से स्पष्ट होता है कि नगरों में संगीत की शिक्षा के लिये कलाभवन और आचार्य भी होते थे। इस प्रकार गुप्तकाल में नृत्य-संगीत के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं।

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प्रश्न 12.
मुगलकाल में किन-किन भाषाओं का विकास हुआ?
उत्तर:
मुगलकाल में, वर्तमान में प्रचलित भाषाओं में से कई भाषाओं का विकास हुआ। कबीर, जायसी, सूरदास, तुलसीदास आदि की रचनाओं का हिन्दी भाषा में विशेष महत्त्व है। मीरा ने राजस्थानी भाषा व मैथली शब्दों का प्रयोग किया। बंगाल में रामायण और महाभारत का संस्कृत से बंगाली भाषा में अनुवाद किया गया। महाराष्ट्र में नामदेव तथा एकनाथ मराठी के प्रसिद्ध सन्त और साहित्यकार हुए। मुगलकाल में शासक साहित्य प्रेमी थे। सभी ने विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया था। इस काल में फारसी और तुर्की भाषा में रचनाएँ लिखी गईं। मुगलकाल में उर्दू साहित्य का सबसे अधिक विकास हुआ। प्रारम्भ में उर्दू को ‘जबान-ए-हिन्दर्वा’ कहा जाता था। अकबर ने संस्कृत भाषा के अनेक ग्रन्थों का अनुवाद फारसी भाषा में करवाया था।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित लेखकों की रचनाएँ लिखिएबाबर, गुलाबदत्त, अब्बास खान, अबुल फजल, मलिक मोहम्मद जायसी, सूरदास, तुलसीदास।
उत्तर:

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प्रश्न 14.
जैन साहित्य के बारे में वर्णन कीजिए। (2010, 15)
अथवा
जैन साहित्य के बारे में कोई चार बिन्दु लिखिए। (2017)
उत्तर:
जैन साहित्य-इस साहित्य की तीन शाखाएँ हैं –

  1. धार्मिक ग्रन्थ, दर्शन और धर्म निरपेक्ष लेखन।
  2. इनमें मुख्यतः काव्य, दन्त कथाएँ, व्याकरण एवं नाटक हैं। इनमें से अधिकार रचनाएँ अभी तक पाण्डुलिपि के रूप में है और गुजरात तथा राजस्थान के चैत्यों में मिलती हैं। रचनाएँ हैं-अंग, पंग, प्रकीर्ण, छेद, सूत्र और मलसूत्र।
  3. अन्तिम चरण में आख्यान एवं दन्तकथाएँ लिखने के लिए उन्होंने प्राकृत के स्थान पर संस्कृत भाषा का प्रयोग किया। व्याकरण और काव्यशास्त्र पर उनके कार्य से संस्कृत की वृद्धि में काफी योगदान हुआ।
  4. जैन साहित्य में भद्रबाहु का कथसूत्र, हेमचन्द्र का परिशिष्ट पर्वन प्रमुख ग्रन्थ हैं।

प्रश्न 15.
सल्तनतकालीन नृत्य-संगीत का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सल्तनत काल में नवीन रागों एवं वाद्य यन्त्रों से हिन्दुस्तानी संगीत का परिचय हुआ। यद्यपि कुरान में संगीत को वर्जित माना गया है। किन्तु समय-समय पर सुल्तानों, सामन्तों आदि खलीफाओं ने इसे प्रोत्साहित किया। इस समय का प्रसिद्ध संगीतकार अमीर खुसरो था जिसने संगीत का वर्णन अपनी पुस्तक ‘नूरह सिपहर’ (नव आकाश) में किया है। इस पुस्तक में लिखा है कि ‘भारतीय संगीत से हृदय और आत्मा उद्वेलित हो जाते हैं। भारतीय संगीत मात्र मनुष्य को ही प्रभावित नहीं करता वरन् यह पशुओं तक को मन्त्र मुग्ध कर देता है। हिरन संगीत सुनकर अवाक खड़े रह जाते हैं और उनका आसानी से शिकार कर लिया जाता है।’ अमीर खुसरो ने भारतीय ईरानी संगीत सिद्धान्तों के मिश्रण से कुछ नवीन रागों को ईजाद किया। कब्बाली का जनक अमीर खुसरो था। तत्कालीन समय में ख्याल तराना जैसी संगीत की नई विधाओं के कारण संगीत के रूप में परिवर्तन आया।

प्रश्न 16.
अमृतसर के हरिमन्दिर की प्रसिद्धि का क्या कारण है?
उत्तर:
गुरुद्वारों में अमृतसर का हरिमन्दिर तत्कालीन समय की अनुपम कृति है। इसका निर्माण 1588 से 1601 ई. के बीच किया गया। यह स्वर्ण मन्दिर अमृतसर नामक सरोवर के मध्य बना हुआ। यह 20 मीटर लम्बे और 20 मीटर चौड़े चार कोनों में चार बुर्जियाँ और बीच में मुख्य गुम्बद है। बाद में इस गुम्बद को महाराजा रणजीत सिंह ने सोने की प्लेटों से सुसज्जित कर दिया। इसलिए यह हरिमन्दिर स्वर्ण मन्दिर के नाम से पुकारा जाने लगा। इसकी चारों दिशाओं में चार चाँदी की दीवारों से मढ़े हुए द्वार हैं। इसकी दीवारें सफेद संगमरमर से बनी हुई हैं।

प्रश्न 17.
मुगलकालीन नृत्य-संगीत कला का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुगलकालीन में नृत्य-संगीत कला फली-फूली। बाबर स्वयं संगीत प्रेमी था। हुमायूँ व शेरशाह सूरी को भी संगीत का शौक था। मुगल सम्राट अकबर ने संगीतज्ञों को आश्रय दिया। अकबर के दरबार में नवरत्नों में से तानसेन उस युग का सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञ था। उस जैसा गायक हजारों वर्षों से नहीं हुआ है। तानसेन की शिक्षा ग्वालियर में हुई थी। तानसेन के अतिरिक्त 36 गायकों को अकबर के दरबार में संरक्षण प्राप्त था। अकबर के समय ध्रुपद गायन की चार शैलियाँ चलन में थीं। मुगलकाल में संगीत के संस्कृत ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद किया गया। मुगलकाल में जहाँगीर के समय खुर्रम दाद, मक्खू, चतुरखाँ और हमजा आदि संगीतज्ञ थे। इसी तरह शाहजहाँ के समय रामदास, जगन्नाथ, सुखसैन और लाल खाँ आदि प्रमुख संगीतज्ञ थे। औरंगजेब संगीत कला का विरोधी था। अत: मुगलकालीन नृत्य-संगीत कला शाहजहाँ के बाद पतन की ओर बढ़ने लगी।

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MP Board Class 9th Social Science Chapter 11 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन भारतीय इतिहास जानने के साहित्यिक स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन भारतीय इतिहास जानने के प्रमुख साहित्यिक स्रोत निम्नलिखित हैं –
(1) वैदिक साहित्य :
आर्यों के प्राचीनतम ग्रन्थ वेद हैं, जिनकी संख्या चार है। ये वेद हैं-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद। इनमें सबसे प्राचीनतम ऋग्वेद है। ऋग्वेद में वैदिककालीन आर्यों के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन का विवरण मिलता है तो सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में उत्तर वैदिक कालीन सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन की विवेचना की गयी है। ऋग्वेद में आर्यों और अनार्यों के मध्य होने वाले संघर्षों तथा आर्यों के राजनीतिक संगठन का भी उल्लेख है।

(2) ब्राह्मण ग्रन्थ तथा उपनिषद् :
ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना यज्ञ तथा कर्मकाण्डों के विधान को समझने के लिए की गयी थी। प्रमुख ब्राह्मण ग्रन्थ-ऐतरेय, शतपथ तथा पंचविश थे। उपनिषदों से तत्कालीन दार्शनिक, सामाजिक तथा धार्मिक चिन्तन का ज्ञान प्राप्त होता है।

(3) पुराण :
पुराणों की संख्या अठारह है परन्तु इनमें वायु, विष्णु, मत्स्य, भविष्य तथा भागवत पुराण सर्वाधिक महत्त्व के हैं। यद्यपि ये सभी धार्मिक ग्रन्थ हैं परन्तु इनका सावधानी से अध्ययन करने पर तत्कालीन इतिहास की पर्याप्त जानकारी हो जाती है।

(4) रामायण तथा महाभारत :
रामायण तथा महाभारत वेदों के पश्चात् सर्वाधिक महत्त्व के ग्रन्थ हैं। रामायण के लेखक महाकवि वाल्मीकि थे तथा महाभारत के मुनि व्यास थे। इन दोनों काव्य ग्रन्थों से हमें उस काल के सामाजिक, थार्मिक तथा आर्थिक जीवन की पर्याप्त जानकारी होती है।

(5) बौद्ध तथा जैन ग्रन्थ :
उपर्युक्त धर्मग्रन्थों के समान ही बौद्ध तथा जैन धर्म के ग्रन्थों का भी अपना विशेष महत्त्व है। प्रमुख बौद्ध ग्रन्थ हैं-विनयपिटक, अभिधम्मपिटक तथा सूतपिटक। इन तीनों ग्रन्थों में भगवान बुद्ध के उपदेशों का उल्लेख करने के साथ-साथ तत्कालीन राजनीतिक घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है। मौर्यकालीन सामाजिक तथा राजनीतिक दशा का ज्ञान कराने में दीपवंश व महावंश नामक अन्य बौद्ध ग्रन्थ सहायक होते हैं।

बौद्ध ग्रन्थों के समान जैन ग्रन्थ भी ऐतिहासिक जानकारी कराने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। जैन ग्रन्थों में तत्कालीन भारत के राजतन्त्रों तथा गणतन्त्रों की व्यवस्था पर प्रकाश डाला गया है। आचार्य हेमचन्द्र द्वारा लिखित ‘परिशिष्ट पर्व’ नामक ग्रन्थ का विशेष महत्त्व है।

(6) साहित्यिक ग्रन्थ :
प्राचीन काल में धार्मिक ग्रन्थों के अतिरिक्त अनेक साहित्यिक ग्रन्थों की भी रचना हुई थी जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं-पाणिनी का अष्टाध्यायी, पतंजलि का महाभाष्य, कालिदास का अभिज्ञानशाकुन्तलम्, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस तथा कल्हण की राजतरंगिणी। इन ग्रन्थों के अध्ययन से तत्कालीन भारत की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक दशा का भी ज्ञान होता है। जयद्रथ की पृथ्वीराज विजय तथा जयचन्द,का हमीर काव्य भी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। तमिल साहित्य में संगम साहित्य का भी अपना विशेष महत्त्व है। संगम साहित्य का अध्ययन करने से हमें दक्षिण भारत के तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन का ज्ञान होता है।

प्रश्न 2.
शाहजहाँ द्वारा बनाई गई इमारतें कौन-कौन-सी हैं? वर्णन कीजिए। (2008)
उत्तर:
स्थापत्य कला की दृष्टि से शाहजहाँ के काल को स्वर्ण युग कहते हैं। उसकी अधिकांश इमारतें संगमरमर के पत्थरों की बनी हुई हैं। शाहजहाँ की इमारतों का विवरण निम्न प्रकार है –

(1) ताजमहल :
ताजमहल विश्व की सबसे सुन्दर तथा कला का उच्चकोटि का नमूना है। इसका निर्माण शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज महल की यादगार में कराया था। इसका निर्माण आगरा नगर के दक्षिण में यमुना के किनारे पर राजा जयसिंह के बगीचे में किया गया था। ताजमहल का नमूना उस्ताद अहमद लाहौरी ने तैयार किया था। वह शाहजहाँ का प्रधान कारीगर था। ताजमहल के निर्माण में 22 वर्ष लगे थे और उसमें 50 लाख रुपये खर्च हुए थे। ताजमहल कला का अद्भुत नमूना माना जाता है।

(2) दीवान-ए-आम :
दीवान-ए-आम का निर्माण शाहजहाँ ने 1628 ई. में आगरा के किले में कराया था। यहाँ पर सम्राट का दरबार लगता था। इसमें दोहरे खम्भों की 40 कतारें हैं। यह हॉल तीनों ओर से खुला हुआ है। उसके खम्भे सुन्दर संगमरमर के बने हुए हैं।

(3) जामा मस्जिद :
यह मस्जिद आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन (मीटरगेज) के सामने स्थित है। इसका निर्माण शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा बेगम ने कराया था। इसकी मुख्य इमारत 103 फुट लम्बी तथा 10 फुट चौड़ी है। इसके निर्माण पर 5 लाख रुपये व्यय हुए थे।

(4) दिल्ली का लाल किला :
इस किले का निर्माण शाहजहाँ ने यमुना के किनारे कराया था। इसकी चौड़ाई 1,600 फुट तथा लम्बाई 3,200 फुट है। इसके भीतर दरबार-ए-आम तथा दरबार-ए-खास का भी निर्माण कराया गया। इस किले में स्थित मोती महल, हीरामहल और रंग महल अधिक प्रसिद्ध हैं।

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